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Archive for सप्टेंबर 14, 2014

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः

                                   ॐ   

                   ॐ भूर्भुवः॒ स्वः ।

 

            तत्सवितुर्वरेण्यं।

 

      भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि ।

 

    धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त् ॥
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ॐ सूर्य यांचा मंत्र

                                               ॐ :                                                                                                            

ॐ भुर्वव स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही| धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वाव स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही |धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वव स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही |धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वव स्व : ॐ तत्यवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तस्यवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वव स्व : ॐ तस्यवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||

ॐ भुर्वव स्व : ॐ तस्यवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही |  धियोयन : प्रचोदयात् ||

                   ॐ :                                                                                                           
ॐ भुर्वव स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही| धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वाव स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही |धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वव स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तत्सवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही |धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वव स्व : ॐ तत्यवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वस्व स्व : ॐ तस्यवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वव स्व : ॐ तस्यवितुर्वण्येम्  भर्गोदेवस्य धिमही | धियोयन : प्रचोदयात् ||
ॐ भुर्वव स्व : ॐ तस्यवितुर्वण्येम् भर्गोदेवस्य धिमही |  धियोयन : प्रचोदयात् ||
 
 

गणपत्यथर्वशीर्षशीर्ष

                                       ॐ
                        गणपत्यथर्वशीर्षशीर्ष

 

ॐ भद्रं कर्णे भी: शृ णुयाम देवा भर्दं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा: ।
स्थिरै रंगै स्तुष्टुवांस्तनु भि र्व्य शे म देवहितं
यदायु: ॥
ॐ स्वस्ति न इन्दो वृ ध्दश्र वा: स्वस्ति न: पूषा
विश्र्ववेदा: ।
स्वस्ति नस्ता र्क्ष्यो s अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो
बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
अथ श्रीगणे शाथर्व शी र्ष व्याख्यास्याम: ।।
ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।।
त्वमेव केवलं कर्ता s सि ।।
त्वमेव केवलं धर्ता s सि ।।
त्वमेव केवलं हर्ता s सि ।।
त्वमेव सर्व खल्विदं ब्रह्मासि ।।
त्वं साक्षादात्मा s सि नित्यमं ।।१।।
ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥ २ ॥
अव त्वं मा म् । अव वक्तार म् ।
अव शरोतार म् । अव दातार म् ।
अव धातार म् । अवानूचानमव शिष्य म् ।
अव पश्चात्ता त् । अव पुरस्ता त् ।
अवोत्तरात्ता त् । अव दक्षिणात्ता त् ।
अव चोर्ध्वा त्ता त् । अवाधरात्ता त्
सर्वतो मां पाहि पाहि समंता त् ॥ ३ ॥
त्वं वाड्. मयस्त्वं चिन्मय: ॥
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय: ॥
त्वं सच्चि दानंदाव्दितियो s सि ॥
त्वं प्रत्यक्ष ब्रह्मासि ॥
त्वं ज्ञानमयो ज्ञानमयो s सि ॥ ४ ॥
सर्व जगदिदं त्वत्तो जायते ॥
सर्व जगदिदं तत्त्वस्तिष्ठति ॥
सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥
सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥
त्वं भूमिरापो s निलो नभ: ॥
त्वं चत्वारि वाकपदानि ॥ ५ ॥
त्वं गुणत्रयातीत: ॥
त्वं अवस्थात्रायातीत: ॥
त्वं देहत्रयातीत: || त्वं कालत्रयातीत: ॥
त्वं मूलाधारस्थतोsसि नित्यं ॥
त्वं शत्कित्रयात्मक: ॥
त्वं योगिनो ध्यायंति नित्यं ॥
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रुद्रस्त्वं इ द्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोमं ॥ ६ ॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतर म् ॥
अनुस्वार: परतर: ॥
अर्धैन्दुलसितं ॥ तारेण ऋध्द म् ॥
एतत्तव मनुस्वरूप म् ॥ गकार: पूर्वरूप म् ॥
अकारो मध्यमरूप म् ॥
अनुस्वारश्र्चां त्यरुप म् ॥
बिम्दुरुत्तररुप म् ॥ नाद: संधान म् ॥
संहिता संधि: । सै षा गणेशवि द्या ॥
गणक ऋ षी: ॥ नि चट् द् गाय त्री छंद: ॥
गणपतिर्देवता ॥
ॐ ग गणपतेय नम: ॥ ७ ॥

गणपत्यथर्वशीर्ष
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्ति: प्रचोदया त् ॥ ८ ॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारि ण म् ॥
रदं च वरदं हस्तै र्बि भ्रा णं मु ष कध्वज म् ॥
रत्त्कं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रत्त्कवासस म् ॥
रत्त्कगंधानुलि प्तांगं रत्त्कपुष्पै: सुपूजित म् ॥
भक्ता नुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युत म् ॥
आविर्भूतं च स्ट ष्टया दौ प्रकृते: पुरषात्पर म् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर: ॥९ ॥

नमो व्रातपतये नमो ग ण पतये नम:
प्रथमपतये नमस्ते अस्तु लंबोदरायै कदं ताय
विघ्ननासिने शिवसुताय
वरदमूर्तये नम: ॥ १० ॥

एतदथर्व शी र्ष यो s धीते ॥
स ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
स सव्रवुघ्नैर्न बाध्यते ॥
स सर्वत: सुखमेधते ॥
स पंचम हापापात्प्रमुच्यते ॥
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥
सायं प्रात: प्रयुंजानो s अपापो भवति ॥
सर्वत्राधियानो s पविघ्नो भवति ॥
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ॥
एदमथार्वशी र्षमशी ष्याय न देयं ॥
यो यदि मोहाधास्यति dhya
स पापीया न्
स पापीया न् भवति ॥
सहस्त्रावर्तना त् ॥
यं यं काममधीते
तं तमनेन साधये त् ॥ ११ ॥

अनेन गणपतीम भि षिं च ति ॥
स वाग्मी भवति ॥
चतु र्थ्यामनश्रनजपति स वि द्द।वा न् भवति
इ त्यथर्व ण वाक्य म् ॥
ब्रह्माद्द।वर णं विद्द। त् ॥
ण बिभेति कदाचनेति ॥ १२ ॥

यो दूर्वांकु रै र्यजति ॥
स वै श्रव णोपमो भवति ॥
यो लाजैर्यजति स यशोवा न् भवति ॥
यो मेघावा न् भवति ॥
यो मोदक सहस्त्रे ण यजति स
वां छितफलमवाप्नोति ॥
य: साज्यसमिध्दिर्यजति स सर्व लभते स
सर्व लभते ॥ १३ ॥

अष्टो ब्राह्म णा न् सम मया ग्र्गा हयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति ॥
सूर्यग्रहे महान द्यां प्रतिमासं निधौ वा जप्त्वा
सधद मंत्रो भवति ॥
महाविघ्ना त्प्र त्मुच्यते ॥
महादोषा त्प्र मुच्यते ॥
महापापात्प्रमुच्यते ॥
स सर्ववि ध्दवति ससर्वविध्दवति
य एवं वेद ॥ १४ ॥ इत्युपनिष त् ॥

ॐ सहनाववतु ॥ सहनौ भुनत्कु ॥
स ह वी र्य करवाव है ॥
तेजस्वि ना व धी त म स्तु मा विव्दि षाव है ॥

ॐ भद्रं कर्णे भी: शृ णुयाम देवा भर्दं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा: ।
स्थिरै रंगै स्तु ष्टु वां स्तनु भि र्व्य शे म देवहितं
यदायु: ॥
ॐ स्वस्ति न इन्दो वृ ध्दश्र वा: स्वस्ति न: पूषा
विश्र्ववेदा: ।
स्वस्ति नस्ता र्क्ष्यो s अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो
बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
ॐ इति सार्थ श्रीग णप त्य थ र्व शी र्ष समाप्त म् ॥

ॐ
ॐ भद्रं  कर्णे भी:   शृ  णुयाम     देवा भर्दं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:  ।
स्थिरै रंगै स्तुष्टुवांस्तनु भि   र्व्य शे म     देवहितं
यदायु:  ॥
ॐ   स्वस्ति  न इन्दो  वृ ध्दश्र वा:  स्वस्ति   न:  पूषा
विश्र्ववेदा:  ।
स्वस्ति   नस्ता  र्क्ष्यो  s   अरिष्टनेमि:  स्वस्ति  नो
बृहस्पतिर्दधातु   ॥
ॐ   शान्ति:   शान्ति:   शान्ति:     ॥
अथ श्रीगणे शाथर्व शी र्ष व्याख्यास्याम: ।।
ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।।
त्वमेव केवलं कर्ता s सि ।।
त्वमेव केवलं धर्ता s सि ।।
त्वमेव केवलं हर्ता s सि ।।
त्वमेव सर्व खल्विदं ब्रह्मासि ।।
त्वं साक्षादात्मा s सि नित्यमं ।।१।।
ऋतं   वच्मि  ।   सत्यं   वच्मि ॥ २ ॥
अव त्वं   मा म् ।  अव  वक्तार म्  ।
अव शरोतार म्  ।  अव दातार म्   ।
अव धातार म् ।    अवानूचानमव   शिष्य म् ।
अव पश्चात्ता त् ।  अव पुरस्ता त्  ।
अवोत्तरात्ता त्  ।  अव दक्षिणात्ता त्  ।
अव चोर्ध्वा त्ता त् ।  अवाधरात्ता त्
सर्वतो  मां   पाहि पाहि   समंता त्   ॥ ३ ॥
त्वं वाड्. मयस्त्वं चिन्मय: ॥
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय: ॥
त्वं सच्चि दानंदाव्दितियो s सि ॥
त्वं प्रत्यक्ष ब्रह्मासि ॥
त्वं ज्ञानमयो ज्ञानमयो s सि ॥ ४ ॥
सर्व  जगदिदं  त्वत्तो  जायते  ॥
सर्व  जगदिदं   तत्त्वस्तिष्ठति ॥
सर्व   जगदिदं   त्वयि   लयमेष्यति  ॥
सर्व   जगदिदं   त्वयि   प्रत्येति  ॥
त्वं  भूमिरापो s  निलो   नभ:  ॥
त्वं चत्वारि वाकपदानि  ॥ ५ ॥
त्वं  गुणत्रयातीत:  ॥
त्वं  अवस्थात्रायातीत:  ॥
त्वं   देहत्रयातीत:  ||  त्वं   कालत्रयातीत:  ॥
त्वं   मूलाधारस्थतोsसि  नित्यं   ॥
त्वं   शत्कित्रयात्मक:  ॥
त्वं  योगिनो  ध्यायंति  नित्यं   ॥
त्वं  ब्रह्मा  त्वं   विष्णुस्त्वं
रुद्रस्त्वं   इ द्रस्त्वं  अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं  चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोमं  ॥ ६ ॥
गणादिं   पूर्वमुच्चार्य   वर्णादिं   तदनंतर म्    ॥
अनुस्वार:  परतर:  ॥
अर्धैन्दुलसितं  ॥   तारेण   ऋध्द म्   ॥
एतत्तव  मनुस्वरूप म्   ॥   गकार: पूर्वरूप  म्   ॥
अकारो  मध्यमरूप  म्   ॥
अनुस्वारश्र्चां त्यरुप म्   ॥
बिम्दुरुत्तररुप  म्  ॥   नाद:  संधान म्   ॥
संहिता   संधि: ।   सै षा  गणेशवि   द्या ॥
गणक  ऋ षी:  ॥   नि  चट्  द् गाय  त्री  छंद:  ॥
गणपतिर्देवता   ॥
ॐ   ग गणपतेय  नम:  ॥ ७ ॥
ॐ
गणपत्यथर्वशीर्ष
एकदन्ताय   विद्महे   वक्रतुण्डाय   धीमहि  ।
तन्नो   दन्ति:   प्रचोदया त्  ॥ ८ ॥
ॐ
एकदन्तं   चतुर्हस्तं   पाशमंकुशधारि ण  म्   ॥
रदं   च   वरदं   हस्तै   र्बि  भ्रा  णं   मु ष  कध्वज  म्  ॥
रत्त्कं   लंबोदरं   शूर्पकर्णकं    रत्त्कवासस म्   ॥
रत्त्कगंधानुलि प्तांगं   रत्त्कपुष्पै: सुपूजित म्   ॥
भक्ता      नुकंपिनं  देवं   जगत्कारणमच्युत   म्   ॥
आविर्भूतं   च स्ट  ष्टया दौ   प्रकृते:  पुरषात्पर  म्   ॥
एवं   ध्यायति   यो   नित्यं   स   योगी   योगिनां   वर:   ॥९  ॥    
ॐ
नमो   व्रातपतये   नमो   ग  ण  पतये   नम:
प्रथमपतये    नमस्ते   अस्तु   लंबोदरायै कदं ताय
विघ्ननासिने   शिवसुताय
वरदमूर्तये   नम:  ॥ १० ॥
ॐ
एतदथर्व  शी र्ष   यो  s  धीते  ॥
स ब्रह्मभूयाय   कल्पते   ॥
स सव्रवुघ्नैर्न    बाध्यते  ॥
स सर्वत:  सुखमेधते   ॥
स  पंचम        हापापात्प्रमुच्यते     ॥
सायमधीयानो   दिवसकृतं   पापं नाशयति   ॥
सायं   प्रात:  प्रयुंजानो s अपापो   भवति ॥
सर्वत्राधियानो s  पविघ्नो  भवति ॥
धर्मार्थकाममोक्षं  च विंदति ॥
एदमथार्वशी     र्षमशी    ष्याय  न   देयं  ॥
यो यदि  मोहाधास्यति    dhya
स  पापीया न्
स पापीया न्  भवति  ॥
सहस्त्रावर्तना  त्  ॥
यं यं काममधीते
तं   तमनेन   साधये  त्   ॥ ११ ॥
ॐ
अनेन   गणपतीम भि षिं  च ति  ॥
स वाग्मी   भवति  ॥
चतु र्थ्यामनश्रनजपति   स वि द्द।वा न्  भवति
इ त्यथर्व ण वाक्य म्  ॥
ब्रह्माद्द।वर   णं  विद्द। त्  ॥
ण बिभेति   कदाचनेति   ॥ १२ ॥
ॐ
यो  दूर्वांकु रै र्यजति   ॥
स वै श्रव णोपमो   भवति   ॥
यो लाजैर्यजति   स      यशोवा न्  भवति   ॥
यो मेघावा  न्   भवति   ॥
यो मोदक   सहस्त्रे ण  यजति   स
वां छितफलमवाप्नोति   ॥
य:  साज्यसमिध्दिर्यजति   स   सर्व   लभते   स
सर्व   लभते   ॥ १३ ॥
ॐ
अष्टो   ब्राह्म  णा न्  सम मया ग्र्गा  हयित्वा
सूर्यवर्चस्वी   भवति   ॥
सूर्यग्रहे   महान द्यां   प्रतिमासं   निधौ   वा   जप्त्वा
सधद मंत्रो   भवति   ॥
महाविघ्ना  त्प्र       त्मुच्यते   ॥
महादोषा  त्प्र मुच्यते    ॥
महापापात्प्रमुच्यते   ॥
स  सर्ववि ध्दवति   ससर्वविध्दवति
य   एवं    वेद   ॥ १४ ॥    इत्युपनिष   त्  ॥
ॐ
ॐ सहनाववतु   ॥    सहनौ   भुनत्कु    ॥
स ह वी  र्य    करवाव   है   ॥
तेजस्वि  ना व धी  त म स्तु   मा    विव्दि  षाव है   ॥
ॐ
ॐ भद्रं  कर्णे भी:   शृ  णुयाम     देवा भर्दं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:  ।
स्थिरै रंगै स्तु ष्टु वां स्तनु भि   र्व्य शे म     देवहितं
यदायु:  ॥
ॐ   स्वस्ति  न इन्दो  वृ ध्दश्र वा:  स्वस्ति   न:  पूषा
विश्र्ववेदा:  ।
स्वस्ति   नस्ता  र्क्ष्यो  s   अरिष्टनेमि:  स्वस्ति  नो
बृहस्पतिर्दधातु   ॥
ॐ   शान्ति:   शान्ति:   शान्ति:     ॥
ॐ इति   सार्थ   श्रीग णप त्य थ र्व शी  र्ष   समाप्त  म्  ॥
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लाल भोपळा भाजी केलेली

                                      ॐ

लाल भोपळा भोपळा साल केलेली भाजी

पूर्वी लाला भोपळा चि भाजी केलेली दाखविली आहे परत परत
तेच तेच लिखाण होत असले तरी नवीन पाहणारे आहेत साठि लिहिली आहे

25 रुपये ला भोपळा पावशे असेल आणला कापून ठेवतात अंदाजे देतात

घरी आल्या नंतर बी काढून धुवून घेतला सुरी ने साल काढून काप केले
तुपजिरे चि फोडणि पतेल्यात केली चिरलेला भोपळा घातला पाणी शिजेल
इतके घातले शेंगदाणे कुट घातला लाल मिरची मीठ घातले मस्त शिजविली वाफ
मस्त आली चावी ला पण गोड भोपळा याची चव आली

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