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Archive for सप्टेंबर 17, 2015

ॐकार वंदना

                                          ॐ 

ॐकार वंदना 

भद्र भाद्रात प्रथमईशा लवूनी करतो वंदना 

तू शिवांकित गौरीवंदन पूर्ण साकार कामना 

दैवभास्करा कमलावरा मी करितो आवाहना 

रत्नजडीत किरीटधारी पूर्ण तूं चंद्रानना 

सूर्यप्रभा नयाने झरे तोषविसी या मना 

स्वरूप सुंदर कर्ण गजसे कर उदार सज्जना 

ॐकार उदरा मूषकधारा वर्णनी जो माईना

सकल विद्दा जाणिता तो सकल कला संयोजना 

अंतरीचे रूप मोहक सारखे लुचते मना 

तूंच इच्छा तूंच कर्ता तूंच साक्षात विश्वना 

विश्वातले मांगल्य तूंची साकार व्हावे पूजना 

भद्र भाद्रात प्रथम ईशा लवूनी करतो वंदना 

२४.८.९० श्रीकांत चिवटे

सर्व ओळीत शेवटी ना आले आहे.

॥ नारद उवाच ॥

ॐ                  अमेरिका
17. 9.( सप्टेबंर ) 2015.
गुरुवार.
भाद्रपद महिना.
ब्लॉग वाचक यांना नमस्कार !
विनंति विशेष.

भाद्रपद शुक्लपक्ष श्री गणपती गणेश चतुर्थी.
गणपती ची एकशे आठ नाव घेऊन दुर्वा वाहतात.

मी गणपती स्तोत्र लिहिले आहे संगणक मध्ये
संस्कृत लिहिणे आवघड पण मी अथर्वशीर्ष पण लिहिले आहे.
मला माझ्या मनाला खूप छान वाटत आहे आपल्याला
संस्कृत संगणक मध्ये लिहिता आले आहे याचे.

मी गणपती स्तोत्र बारा नाव नारद उवाच लिहिले तर आहेच
पण संगणक मध्ये टेप व्हीडीओ तयार केला आहे.
मला मस्त मन भरून चांगल वाटत आहे.
आपण
व्हीडीओ ऐकावा सदिच्छा !
बाकि ठिक. छान.
वसुधालय.

[youtube:https://www.youtube.com/watch?v=82onG4vaitg%5D

श्रीपाद श्रीवल्लभ

                               ॐ
श्रीपाद श्रीवल्लभ
श्रीपाद श्रीवल्लभ यांचा जन्म भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी ला झाला.

गणेश चतुर्थी ला झाला.कृष्ण-यजुर्वेद शाखा आपस्तंब सूत्र,
भारव्दाज गोत्रोद् भव ब्रह्मश्री घंडिकोटा अप्पालराज शर्मा आणि
महाराणी सुमतीदेवी यांच्या पोटी झाला. या अवताराची माहिती
गुरुचरित्रात, पाच,आठ,नऊ.व दहा या चार अध्यायात आलेली आहे.
श्रीवल्लभ स्वामींचा काळ इ.स.१३२० ते १३५० असा तीस वर्षाचा आहे.
श्रीपाद श्रीवल्लभ यांनी कुरवपूर येथे जरी वयाच्या अवघ्या तिसाव्या वर्षी
कृष्णेत अदृश्य होऊन आपले जीवित कार्य समाप्त केले असलेतरी ते भक्तां ची
आजही काळजी घेतात.त्यांना दर्शन देतात.अशी भक्तांची श्रध्दा आहे.
हि सर्व माहिती तरुण भारत कोल्हापूर दिनांक १९ सप्टेंबर पान नंबर ४ मध्ये आहे.

ॐ ॥ श्री गणपतिस्तोत्रं ॥

                                       ॐ

श्री गणपतिस्तोत्रं

श्री गणेशाय नाम:

नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्

भत्त्कावासं स्मरेन्नित्यमायुकामार्थसिध्दये ॥१॥

प्रथमं वक्रतुंडं एकदंतं व्दितियकमं

तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥२॥

लंबोदरं पंचमं षष्ठं विकटमेव

सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टममं ॥३॥

नवमं भालचंद्रं दशमं तु विनायकमं

एकादशं गणपतिं व्दादशं तु गजाननमं ॥४॥

व्दादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं पठेन्नर:

विघ्नभयं तस्य सर्वसिध्दीकरं प्रभो ॥५॥

विविद्दार्थी लभते विद्दां धनार्थी लभते धनम्

पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थि लभतेगतिमं ॥६॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्र्भिमासैफलं लभेत्

संवत्सरेण सिध्दि लभते नात्र संशय॥७॥

अष्टभ्यो ब्राःमनेभयश्र्च लिखित्वा : समर्पयेत

तस्य वि द्द। भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:॥ ८ ॥

ईति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं नाम

श्रीगणपति स्तोत्रं संपुर्णमं

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अथर्वशीर्ष

                         ॐ
ॐ भद्रं  कर्णे भी:   शृ  णुयाम     देवा भर्दं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:  ।
स्थिरै रंगै स्तुष्टुवांस्तनु भि   र्व्य शे म     देवहितं
यदायु:  ॥
ॐ   स्वस्ति  न इन्दो  वृ ध्दश्र वा:  स्वस्ति   न:  पूषा
विश्र्ववेदा:  ।
स्वस्ति   नस्ता  र्क्ष्यो  s   अरिष्टनेमि:  स्वस्ति  नो
बृहस्पतिर्दधातु   ॥
ॐ   शान्ति:   शान्ति:   शान्ति:     ॥
अथ श्रीगणे शाथर्व शी र्ष व्याख्यास्याम: ।।
ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।।
त्वमेव केवलं कर्ता s सि ।।
त्वमेव केवलं धर्ता s सि ।।
त्वमेव केवलं हर्ता s सि ।।
त्वमेव सर्व खल्विदं ब्रह्मासि ।।
त्वं साक्षादात्मा s सि नित्यमं ।।१।।
ऋतं   वच्मि  ।   सत्यं   वच्मि ॥ २ ॥
अव त्वं   मा म् ।  अव  वक्तार म्  ।
अव शरोतार म्  ।  अव दातार म्   ।
अव धातार म् ।    अवानूचानमव   शिष्य म् ।
अव पश्चात्ता त् ।  अव पुरस्ता त्  ।
अवोत्तरात्ता त्  ।  अव दक्षिणात्ता त्  ।
अव चोर्ध्वा त्ता त् ।  अवाधरात्ता त्
सर्वतो  मां   पाहि पाहि   समंता त्   ॥ ३ ॥
त्वं वाड्. मयस्त्वं चिन्मय: ॥
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय: ॥
त्वं सच्चि दानंदाव्दितियो s सि ॥
त्वं प्रत्यक्ष ब्रह्मासि ॥
त्वं ज्ञानमयो ज्ञानमयो s सि ॥ ४ ॥
सर्व  जगदिदं  त्वत्तो  जायते  ॥
सर्व  जगदिदं   तत्त्वस्तिष्ठति ॥
सर्व   जगदिदं   त्वयि   लयमेष्यति  ॥
सर्व   जगदिदं   त्वयि   प्रत्येति  ॥
त्वं  भूमिरापो s  निलो   नभ:  ॥
त्वं चत्वारि वाकपदानि  ॥ ५ ॥
त्वं  गुणत्रयातीत:  ॥
त्वं  अवस्थात्रायातीत:  ॥
त्वं   देहत्रयातीत:  ||  त्वं   कालत्रयातीत:  ॥
त्वं   मूलाधारस्थतोsसि  नित्यं   ॥
त्वं   शत्कित्रयात्मक:  ॥
त्वं  योगिनो  ध्यायंति  नित्यं   ॥
त्वं  ब्रह्मा  त्वं   विष्णुस्त्वं
रुद्रस्त्वं   इ द्रस्त्वं  अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं  चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोमं  ॥ ६ ॥
गणादिं   पूर्वमुच्चार्य   वर्णादिं   तदनंतर म्    ॥
अनुस्वार:  परतर:  ॥
अर्धैन्दुलसितं  ॥   तारेण   ऋध्द म्   ॥
एतत्तव  मनुस्वरूप म्   ॥   गकार: पूर्वरूप  म्   ॥
अकारो  मध्यमरूप  म्   ॥
अनुस्वारश्र्चां त्यरुप म्   ॥
बिम्दुरुत्तररुप  म्  ॥   नाद:  संधान म्   ॥
संहिता   संधि: ।   सै षा  गणेशवि   द्या ॥
गणक  ऋ षी:  ॥   नि  चट्  द् गाय  त्री  छंद:  ॥
गणपतिर्देवता   ॥
ॐ   ग गणपतेय  नम:  ॥ ७ ॥


गणपत्यथर्वशीर्ष
एकदन्ताय   विद्महे   वक्रतुण्डाय   धीमहि  ।
तन्नो   दन्ति:   प्रचोदया त्  ॥ ८ ॥


एकदन्तं   चतुर्हस्तं   पाशमंकुशधारि ण  म्   ॥
रदं   च   वरदं   हस्तै   र्बि  भ्रा  णं   मु ष  कध्वज  म्  ॥
रत्त्कं   लंबोदरं   शूर्पकर्णकं    रत्त्कवासस म्   ॥
रत्त्कगंधानुलि प्तांगं   रत्त्कपुष्पै: सुपूजित म्   ॥
भक्ता      नुकंपिनं  देवं   जगत्कारणमच्युत   म्   ॥
आविर्भूतं   च स्ट  ष्टया दौ   प्रकृते:  पुरषात्पर  म्   ॥
एवं   ध्यायति   यो   नित्यं   स   योगी   योगिनां   वर:   ॥९  ॥  

नमो   व्रातपतये   नमो   ग  ण  पतये   नम:
प्रथमपतये    नमस्ते   अस्तु   लंबोदरायै कदं ताय
विघ्ननासिने   शिवसुताय
वरदमूर्तये   नम:  ॥ १० ॥


एतदथर्व  शी र्ष   यो  s  धीते  ॥
स ब्रह्मभूयाय   कल्पते   ॥
स सव्रवुघ्नैर्न    बाध्यते  ॥
स सर्वत:  सुखमेधते   ॥
स  पंचम        हापापात्प्रमुच्यते     ॥
सायमधीयानो   दिवसकृतं   पापं नाशयति   ॥
सायं   प्रात:  प्रयुंजानो s अपापो   भवति ॥
सर्वत्राधियानो s  पविघ्नो  भवति ॥
धर्मार्थकाममोक्षं  च विंदति ॥
एदमथार्वशी     र्षमशी    ष्याय  न   देयं  ॥
यो यदि  मोहाधास्यति    dhya
स  पापीया न्
स पापीया न्  भवति  ॥
सहस्त्रावर्तना  त्  ॥
यं यं काममधीते
तं   तमनेन   साधये  त्   ॥ ११ ॥


अनेन   गणपतीम भि षिं  च ति  ॥
स वाग्मी   भवति  ॥
चतु र्थ्यामनश्रनजपति   स वि द्द।वा न्  भवति
इ त्यथर्व ण वाक्य म्  ॥
ब्रह्माद्द।वर   णं  विद्द। त्  ॥
ण बिभेति   कदाचनेति   ॥ १२ ॥


यो  दूर्वांकु रै र्यजति   ॥
स वै श्रव णोपमो   भवति   ॥
यो लाजैर्यजति   स      यशोवा न्  भवति   ॥
यो मेघावा  न्   भवति   ॥
यो मोदक   सहस्त्रे ण  यजति   स
वां छितफलमवाप्नोति   ॥
य:  साज्यसमिध्दिर्यजति   स   सर्व   लभते   स
सर्व   लभते   ॥ १३ ॥


अष्टो   ब्राह्म  णा न्  सम मया ग्र्गा  हयित्वा
सूर्यवर्चस्वी   भवति   ॥
सूर्यग्रहे   महान द्यां   प्रतिमासं   निधौ   वा   जप्त्वा
सधद मंत्रो   भवति   ॥
महाविघ्ना  त्प्र       त्मुच्यते   ॥
महादोषा  त्प्र मुच्यते    ॥
महापापात्प्रमुच्यते   ॥
स  सर्ववि ध्दवति   ससर्वविध्दवति
य   एवं    वेद   ॥ १४ ॥    इत्युपनिष   त्  ॥


ॐ सहनाववतु   ॥    सहनौ   भुनत्कु    ॥
स ह वी  र्य    करवाव   है   ॥
तेजस्वि  ना व धी  त म स्तु   मा    विव्दि  षाव है   ॥


ॐ भद्रं  कर्णे भी:   शृ  णुयाम     देवा भर्दं
पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:  ।
स्थिरै रंगै स्तु ष्टु वां स्तनु भि   र्व्य शे म     देवहितं
यदायु:  ॥
ॐ   स्वस्ति  न इन्दो  वृ ध्दश्र वा:  स्वस्ति   न:  पूषा
विश्र्ववेदा:  ।
स्वस्ति   नस्ता  र्क्ष्यो  s   अरिष्टनेमि:  स्वस्ति  नो
बृहस्पतिर्दधातु   ॥
ॐ   शान्ति:   शान्ति:   शान्ति:     ॥

ॐ इति   सार्थ   श्रीग णप त्य थ र्व शी  र्ष   समाप्त  म्  ॥

 

ॐ अथर्वशीर्ष मला पाठ आहे.
पोथी वाचल्या  मूळे जीभ चांगली वळते उच्चार स्पष्ट होतात.

 

१०८ दूर्वा समर्पण करणे

                                         ॐ

१०८ दूर्वा समर्पण करणे – अष्टोत्तरशतनामावलि म्हणणे –

अस्य श्रीविघ्नेश्र्वराष्टोत्तरशत – दिव्यनामामृत – स्तोत्रमंत्रस्य, गृत्समद ऋषि : गणपतिद्रेवता,
अनुष्टुप् छंद : ग बीजं नं शक्ति :, मं कीलकम्, श्रीसत्यविनायकप्रसादसिध्यर्थं दूर्वाकुरार्पणे विनियोग:

| ॐ विनायकाय नम : | ॐ विघ्नराजाय नम : | ॐ गौरीपुत्राय नम :
| ॐ गणेश्र्वराय नम : | ॐ स्कंदाग्रजाय नम : |ॐ अव्ययाय नम :
| ॐ पूताय नम : | ॐ दयाध्यक्षाय नम : | ॐ व्दिजप्रियाय नम : | ॐ अग्निगर्वच्छदे नम : ||१० ||

ॐ इंद्रश्रीप्रदाय नम : | ॐ वाणीबलप्रदाय नम : | ॐ सर्वसिध्दिमते नम :
|ॐ शर्वतनयाय नम : | ॐ शिवप्रियाय नम : | ॐ सर्वात्मकाय नम : | ॐ सृष्टिकर्त्रे नम :
| ॐ देवानीकार्चिताय नम : | ॐ शीवाय नम : | ॐ शुध्दाय नम : ||२०||

ॐ बुध्दिप्रियाय नम : | ॐ शांताय नम : | ॐ ब्रह्मचारिणे नम : | ॐ गजाननाय नम :
| ॐ व्दैमातुराय नम : | ॐ मुनिस्तुताय नम : | ॐ भक्तविघ्नविनाशनाय नम :
| ॐ एकदंताय नम : | ॐ चतुर्बाहवे नम : | ॐ चतुराय नम : ||३० ||

ॐ शक्तिसंयुताय नम : | ॐ लंबोदराय नम : |ॐ शूर्पकर्णाय नम :
| ॐ हेरंबाय नम : | ॐ ब्रह्मवित्तमाय नम : | ॐ कालाय नम : ॐ ग्रहपतये नम :
|ॐ कामिने नम : | ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नम : | ॐ पाशांकुशधराय नम : ||४० ||

ॐ चम्दाय नम : | ॐ गुणातीताय नम : | ॐ अकल्मषाय नम :
| ॐ स्वयंबध्दाय नम : | ॐ सिध्दार्चित -पदांबुजाय नम : | ॐ बीजपूरप्रियाय नम : |
ॐ अव्यक्ताय नम : | ॐ वरदाय नम : | ॐ शाश्र्वताय नम : | ॐ कृतिने नम : || ५० ||

ॐ विव्दत् – प्रियाय नम : | ॐ वीतभयाय नम : | ॐ गदिने नम : | ॐ चक्रिणे नम :
| ॐ इक्षुचापघृते नम : | ॐ अजोत्पलकराय नम : | ॐ श्रीशाय नम : | ॐ निरंजनाय नम :
| ॐ श्रीपतिस्तुतिहर्षिताय नम : | ॐ कुलाद्रिभ्रुते नम : ||६० ||

ॐ जटिने नम : | ॐ चंद्रचुडाय नम : | ॐ अमरेश्र्वराय नम : | ॐ नागोपवीतिने नम :
| ॐ श्रीकंठाय नम 😐 ॐ रामार्चितपदाय नम : | ॐ व्रतिने नम : | ॐ स्थुलकंठाय नम :
| ॐ त्रयीकत्रे नम : | ॐ सामधोशप्रियाय नम : ||७० ||

ॐ अग्रगण्याय नम : | ॐ पुरुषोत्तमाय नम : | ॐ स्थूलतुंण्डाय नम :
| ॐ ग्रामण्ये नम 😐 ॐ गणपाय नम : | ॐ स्थिराय नम : | ॐ वृध्दिदाय नम :
| ॐ सुभगाय नम : | ॐ शूराय नम : | ॐ वागीशाय नम : || ८० ||

ॐ सिध्सिदाय नम : | ॐ दुर्वाबिल्वप्रियाय नम : | ॐ काम्ताय नम :
| ॐ पापहारिणे नम : | ॐ कृतागमाय नम : | ॐ समाहिताय नम : | ॐ वक्रतुंडाय नम :
| ॐ श्रीप्रदाय नम : | ॐ सौम्याय नम : | ॐ भक्तकांक्षितदात्रे नम : || ९० ||

ॐ अच्यताय नम : | ॐ केवलाय नम : | ॐ सिध्दिदाय नम :
| ॐ अच्चिदानंदविग्रहाय नम : | ॐ ज्ञानिने नम : | ॐ मायायुताय नम :
| ॐ दांताय नम : | ॐ ब्रह्मिष्ठाय नम : | ॐ भयविर्जिताय नम : | ॐ प्रमत्तदैत्यभयदाय नम : || १०० ||

ॐ व्यक्तमूर्तये नम : | ॐ अमूर्तिकाय नम : | ॐ पार्वतिशंकरोत्संगखेलनोत्सवलालसाय , नम :|ॐ समस्तजगदाधाराय नम 😐 ॐ वरमूषकवाहनाय नम 😐 ॐ हृष्टचित्ताय नम : |
ॐ प्रसन्नात्मने नम : | ॐ सर्वसिध्दिप्रदायकाय नम : || १०८ ||

अनेन अष्टोत्तरशतनामभि: दुर्वांकुरार्पणेन श्रीसत्यविनायक : प्रियताम् न मम |

 

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